सदगुरुओं के तरीके

सदुगुरुओं की चेतना सर्वथा वयक्तिनिरपेक्ष एवम् पूर्णत: विश्वव्यापी हुआ करती है। किन्तु अपने आध्यात्मिक प्रयोजन की सिध्दि के लिए अपने कार्य-क्षेत्र को सीमित कर सकते है तथा अपने अभिव्यक्त व्यक्तित्व को अपने शिष्यों की आकाँक्षाओं का केन्द्र-स्थल बनने देते है। वे अपने सम्पर्क में आने वाले साधकों की सहायता करने के लिए व्यक्तिगत सम्बन्धों तथा अन्य नियम प्रणालियों का उपयोग करते हैं। वे सदैव ऐसे लोगों की तलाश में रहते हैं, जिन्हे उनकी सहायता की आवश्यकता रहती है, तथा जो उनकी सहायता के अधिकारी होते है। वे आध्यात्मिक उत्कण्ठा के क्षीण से क्षीण स्फुरण को भी दुर्लक्ष्य नहीं करते । वे नानाविध तरीकों से सभी साधकों की आध्यात्मिक वृध्दि को प्रवर्तित तथा प्रोत्साहित करते हैं, और उनके तरीके निश्चित रूप् से प्रभावशाली होते है, यद्यपि वे दूसरों के लिए आवश्यकत: बुध्दिग्राह्य नहीं होते।

उनकी सहायता का प्रकार
गुरु की सहायता आध्यात्मिक यात्रा को निश्चित तथा सुरक्षित करने में रहती है, और वह यात्री को थोड़े ही समय में लक्ष्य तक पहुंचा देते हैं। गुरु के बिना यात्रा अनिश्चित तथा अरक्षित रहती है, और समय तथा शक्ति का बहधा अवव्यय होता है। साधक स्वतंत्र रूप से काफी दूर तक अनुसंधान कर सकता है; किन्तु छठी भूमिका को वह गुरु की सहायता के बिना पार नहीं कर सकता। किन्तु मध्यस्त भूमिकाओं में भी, गुरु की सहायता अत्यन्त उपयोगी सिध्द होती है, क्योंकि गुरु बीच रास्ते में ही अटकावों से तथा मार्गवर्ती खतरनाक गर्तों में गिरने से बचा लेते है। कबीर मार्ग की तीन स्थितियों की तुलना आग की तीन अवस्थाओं से करते हैं। जिस प्रकार पहले सिर्फ धुऑं होता है और आग नही रहती, उसके बाद धुएँ से लिपटी हुई आग होती है, और अन्त में केवल आग होती है, तथा धुऑं बिल्कुल नहीं रहता, उसी प्रकार, आध्यामिक प्रथा की प्राथमिक स्थिति में, प्रगाढ अज्ञान रहता है, मध्यस्थिति में ईश्वर का अज्ञानावेष्टित ज्ञान रहता है,
तथा अन्तिम स्थिति में, केवल सहानुभूति रहती है, जो लेशमात्र भ्रम से भी अवगुण्ठित नहीं रहती। चूँकि पथ अनेक भ्रमों से आकीर्ण रहता है, अत: गुरु के मार्ग-प्रदर्शन के बिना साधक कभी भी सुरक्षित नहीं रह सकता। गुरु मार्ग की विपत्तिायों से परिचित रहता हैं; और वह साधक को उनसे बचा ले जाता है।

भ्रमनिकेतन
अंतर्दृष्टि के खुलने के पहले, मन लक्ष्य को अनन्तवत् समझता है। अनन्त का विचार किसी ऐसी लाक्षणिक प्रतिभापर अवलम्बित रहता है, जिससे विशालता का बोध होता है, जैसे आकाश या समुद्र । यद्यपि अनन्त के ये विचार सुस्पस्ट तथा सुनिश्चित होते हैं। तथापि अनन्त के स्वतंत्र एवम् प्रत्यक्ष ज्ञान के द्वारा उनका निरस्त होना आवश्यक है। साधक आत्मा को प्रत्यक्षत: तभी देखता है, जब उसका मन चौंधिया जाता है। जो कुछ वह देखता है। जो कुछ वह देखता है, वह उतना भी स्पष्ट नहीं दिखाई देता है, जितना स्पष्ट अंतर्चक्षु के खुलने के पूर्व दिखाई देता था। आत्मा की चकाचौंध से मन चौंधिया जाता है, स्पष्ट विचार करने में वह असमर्थ को जाता है, और आत्मदर्शन को आत्मानुभूति समझने की भूल कर बैठता है। इसी प्रकार, मार्गवर्ती स्थिति को ही यह स्थिति 'मुकाम-ए आफसन', अर्थात भ्रम का निवासस्थान कहलाता है। पथ की ऐसी संकटापन्न परिस्थिति में ही गुरु की आवश्यकता होती है। ऐसे मौके पर गुरु साधक को एक धक्का देता है, जिससे वह रास्ते में रूके नहीं बल्कि अपनी यात्रा जारी रखे।

गुरु की देन
सच पूछा जाय तो प्रत्येक मध्यवर्ती आंतरिक भूमिका में साधक का अटकने तथा आवश्यक विलम्ब करने का डर रहता ही है क्योकि वह अत्यंत चित्तााकर्षक होती है। प्रत्येक भूमिका एक प्रलोभन पाश के तुल्य है। गुरु साधक से या तो इनको पार करवा लेता है या इनके बीच से उसे बिना किसी अनावश्यक विलम्ब से निकाल ले जाता है।
चलना तो खुद साधक को पड़ता है किन्तु पूर्व प्राप्त सहज ज्ञानी तथा अन्त:प्रज्ञा को स्थिर तथा दृढ करने में एवम् अप्रत्याशित किन्तु अवारणीय अग्रगमन के लिये चेतना को क्षिप्रतापूर्वक सन्नध्द करने में गुरु की देन निहित रहती है।

शिष्यों की संशय रहित श्रध्दा
गुरु शिष्य को माया से निकालने के लिए माया का ही उपयोग करता है। वह स्वयं तो अच्छे और बुरे से परे रहता है। किन्तु कभी कभी वह ऐसी भी आशाएँ देता है जो उसके शिष्यों की ''सुबुध्दि'' को अस्वीकार्य तथा आश्चर्यजनक सी मालूम होती है। ऐसे प्रसंगो पर गुरु की आज्ञाओं को अभियुक्त बनाकर अपनी परिमित बुध्दि के न्यायालय में उपस्थित करना उचित नहीं है। शंका संशय-शून्य श्रध्दा के साथ उनका नम्रतापूर्वक पालन करना ही शिष्य का परम कर्तव्य है। निम्न-लिखित सुप्रसिध्द उदाहरणों से यह बात स्पष्ट हो जाएगी।
कुरान में एक कथा हैख् कि अब्राहम को अपने प्यारे बेटे इस्माइल की खुदकी खातिर, कुरबानी कर देने का हुक्म मिला।
जब अब्राहम अपने लड़के का गला काटने को तैयार हुए तब ऐसा चमत्कार हुआ कि लड़का तो बच गया और उसकी जगह एक बकरे की कुरबानी हो गई। गुरु शम्सत बरेज़ को प्रसन्न करने तथा उसका अनुग्रह प्राप्त करने की गरज से मौलाना रूमी ने अपने गुरु की मैकरे से शराब उठा लाने की, आज्ञा का पालन करने में जरा भी आना-कानी नहीं की। अपने समय में इस्लामी दूनिया के एक बड़े भारी धर्मनिष्ठ शास्त्री होने के नाते मौलानी रूमी की आध्यात्मवादी मुसलवानों में बड़ी प्रतिष्ठा थी, और इस्लाम धर्म में मुसलवानों के लिए शराब पीना निषिध्द(हराम) है। अत: अपने कंधे पर शराब का प्याला लेकर सड़क पर से चलना, मौलाना के लिए एक कठोर कार्य था। किन्तु यह कठिन परीक्षा थी, जिसमें वे उत्ताीर्ण हुए।
गौसाली शाह के गुरु गंगा नदी के किनारे एक कुटिया में रहते थे। उन्होने अपने शिष्य को नदी की बीच धार से एक घड़ा भर पानी पीने के लिये लाने का हुक्म दिया। आधी रात का वक्त था और वर्षा की वजह से गंगा में खूब बाढ़ आयी हुई थी। शिष्य पहले तो हिचकिचाया किन्तु बाद में साहस बटोरकर तथा गुरु की सर्वज्ञता पर विश्वास करके असम्भव को सम्भव करने के लिए उद्यत हुआ। प्रकुप्त जल-प्रवाह के भीतर वह उतर नहीं पाया था कि नदी में उसे आश्चर्यजनक परिवर्तन दिखाई दिया। बाढ़ की क्षुब्ध तरंगो की जगह नदी में केवल एक पतली जल धारा बह रही थी।उसका घड़ा नदी के नले का छू जाता था। बीच धार की तलाश में शिष्य नदी के दूसरी तह तक आ गया। इस प्रकार जब कि वह खोज-तलाश में मशहुल था उसके गुरु ही वहाँ आ उपस्थित हुए और विलम्ब का कारण पूछा। जब शिष्य ने बतलाया कि बीच धार निश्चित करना मुश्किल हो गया है तो गुरु ने पतली धार से ही हाथो द्वारा पानी भरने की इजाजत दी और पानी भरने में स्वयम् शिष्य की सहायता करने लगे। कुछ बहाना बताकर गुरु शिष्य का घड़ा भर कर तुरन्त आने के लिए कह कर चलते बने। जब गौसाली शाह कुटिया में लौटा तो अन्य शिष्यों से यह सुनकर उसके आश्चर्य की सीमा न रही कि उनके गुरु उनकी गैरहाजरी में उन्हें छोड़कर एक क्षण के लिए भी बाहर नहीं गये किन्तु वे लगातार उसके बारे में उनसे बातचीत करते रहे।
उक्त दृष्टान्तों से मालूम होगा कि गुरु बिरले प्रसंगो पर शिष्यों के अहंकार को नष्ट-भ्रष्ट करने तथा उन्हें पथ में आगे बढाने के लिए अपनी गूढ़ शक्तियों का भी उपयोग कर सकते हैं; किन्तु नियमत:, वे अपनी दिव्य शक्तियों का बहुत ही कम उपयोग करते हैं, और वे उनका उपयोग तब तक हरगिज नहीं करते जब तक ऐसा करना आध्यात्मिक कारणों से निहायत जरूरी नहीं। सामान्यत: सांसारिक मनुष्यों के साधारण तरीकों से ही उनका काम निकल जाता है। किन्तु साधारण तरीकों का उपयोग करते हुए भी वे महान ज्ञान, तीक्ष्ण विनोद-भाव, असीम प्रतिज्ञा तथा पूर्ण व्यवहार कौशल से काम लेते हैं। इतना ही नही किन्तु वे अपने शिष्याें की सहायता करने में बड़े कष्ट उठाते तथा परिस्थिति की आवश्यकता के अनुरूप् असंख्य तरीकों से वे अपने आपको व्यवस्थित करते हैं।
उपर्युक्त कुछ बातें महान आध्यात्मिक बहलुल की कथा से स्पष्ट हो जाएगी।
बहुलल अपने कुछ निजी कारणों से फारस के गणमान्य व्यक्तियों से अपना सम्पर्क स्थापित करना चाहते थे। राजा की सभाओं में ही वे गणमान्य व्यक्ति उपस्थित होते थे। अत: राजसभा में जाने से ही बहुलल का काम सधता था। किन्तु दुर्भाग्यवश बहुलल का सिर गँजा था और किसी भी केशहीन व्यक्ति को राज-सभा में प्रवेश की अनुमति नहीं थी। राजा के सिर में एक भी बाल न था और दूसरों को केशहीन देखकर उसे अपने गंजेपन का ख्याल आ जाता था और वह सभा का आनंद नहीं ले पाता था। राजा इस विषय पर इतना तुनुक मिजाजी था कि किसी भी गंजे व्यक्ति को सभा के भीतर आने की इजाजत नहीं थी और जब गंजा सिरवाला बहुलल अपने गन्दे मैले कपड़ो में सभा में पहुँचा तो वह खदेड़ दिया गया। किन्तु सभा तीन निदो के लिये लायी गयी थी। बहुलल ने किसी सज्जन से अच्छी पोशाक तथा कृत्रिम केश उधार लिये। रूप बदलकर, और सजधज और ठाट-बाट के साथ बहुलल दूसरे दिन सभा में गया। सभा के कार्यकाल में किसी ने भी बहुलल का नहीं पहचाना, और सभा में उपस्थित समस्त प्रतिष्ठित व्यक्तियों पर बहुलल ने अपनी सज्जनता की धाक बैठा दी। वह इतना ज्यादा सामान्य और प्रिय बन बैठा कि स्वंय राजा ने उस का आदरपूर्वक स्वागत किया और अपने पास बैठने का निमंत्रण दिया। अपनी जगह पर बैठने के पश्चात ही राजा की ओर दखकर बहुलल ने ऑंख मारी। राजा इस ऑंख मारने का कुछ भी मतलब नहीं समझा। उसे कुछ ऐसा महसूस हुआ कि ऐसे लब्ध-प्रतिष्ठित व्यक्ति के अंग-विक्षेप का कुछ तो अर्थ होना ही चाहिए और यह सोचकर कि इस संकेत के प्रत्युत्तार की आवश्यकता है तो वह भी बहुलल की ओर देखकर ऑंख मारने लगा। राजा के पास बैठने वालों ने ऑंख मारने का आदान-प्रदान देखा। उन्हे कुछ ऐसा लगा मानो उन्हें भी ऐसा ही करना चाहिये। उनका इस प्रकार ऑंख मारने का यह क्रम-उपक्रम पूरी भीड़ में व्याप्त हो गया और पाँच मिनिट तक ऑंख मारने के सिवाय कुछ नहीं हुआ। तब बहुलल ने चिल्लाकर कहा, ''महाशयों, ठहरों। तुम ऑंख क्यों मारतें हो ? '' गणमान्य व्यक्तियों ने जबाब दिया, आप जैसे महापुरूषों को ऑंख मारते देखकर हम भी ऑंख मार रहे हैं। हम तो केवल आपकी नकल कर रहे हैं। इस पर तुरन्त अपना बाल-वाला टोप सिर से निकालकर बहुलल ने कहा ''हम दोनो गंजे है। हमारी नकल करो'' सभी गणमान्य सज्जन चले गये और तीसरे दिन वे सभी अपने सिर मुड़ाकर आये। तब बहुलल राजा से बोले- ''हम दोनो तो स्थायी रूप से गंजे है, किन्तु इन सब लोगों को गंजा रहने के लिए हर दिन अपना सिर मुड़ाना पड़ेगा ।'' इस प्रकार बहुलल अपने विनोद तथा व्यवहार कुशलता के बल पर उन लोगों के निकट पहुँच गया जिन्हे वह मदद करना चाहता था।

शिष्यों की त्रुटियों से बर्ताव
गुरु शिष्य से संपर्क स्थापित करने तथा उसे आध्यात्मिक मार्ग में खींचलाने के लिए कुछ भी नहीं उठा रखता। यदि गुरु के प्रति शिष्य का प्रेम नष्ट न हो जाय तो उसकी आध्यात्मिक उन्नति निश्चित रहती है। अत: गुरु उन तमाम बाधाओं को एक-एक करके दूर कर देता है, जो शिष्य की सर्वात:करण युक्त भक्ति को अवरूध्द करती है। वे बाधाएं उनके पथ के विकट रोड़े न बनने पावें, इसीलिए वह अक्सर शिष्य के वैयक्तिक स्वभाव की स्तुति करता है। कभी कभी वह शिष्य की अहंवृत्ति का साथ भी देता है। किन्तु यह उसके अज्ञान को नष्ट, अस्थायी रूप् से सहारा देने तथा उसकी प्रवृत्ति को अन्तिम रूप से नष्ट करने के लिए शिष्य को तैयार करने के ही उददेश्य से वह ऐसा करता है, जैसे वध किये जाने के पहले बलिदान के बकरे खूब खिलाये-पिलाये जाते हैं। अच्छे व बुरे से परे रहने के कारण गुरु शिष्य की त्रुटियों और दोषों से अस्थिर नहीं होता। असीम प्रतिज्ञा के साथ वह उन्हें सहन करता है और अनन्त समय तक धीरज रखने की उसमें क्षमता होती है। वह जानता है कि शिष्य के साथ में दृढता के साथ आरूढ होते ही उस पथ की त्रुटियों और दुर्बलताओं को दूर करने में कुछ भी समय नहीं लगेगा।

चित्त शुध्दि की विधि
किन्तु गुरु को इस बात का सन्तोष होते ही कि शिष्य पथ पर दृढ़ता-पूर्वक आरूढ़ हो गया है वह शिष्य के चित्त प्रकार ज्योंही शस्त्रवैद्य के निरीक्षण में रोगी आता है, त्योंही वह अपनी छूरी लेकर घाव की चीरफाड़ में लग जाता है, और वह रोगी के रोने चिल्लाने तथा विरोध की जरा भी परवाह नहीं करता; उसी प्रकार गुरु भी शिष्य की चित्त-शुध्दि कठोरता पूर्वक करता है। किन्तु आगे चलके शिष्य को पता चलता है, कि गुरु की कठारता उसके कल्याण के ही लिए थी अत: वह अपने गुरु से कभी विमुख नहीं होता और गुरु के द्वारा की गई अप्रिय तथा पीड़ादायक चित्त-शुध्दि की क्रिया से वह गुरु के अधिक निकट आता है।

प्रशंसा के द्वारा सहायता
गरु का साधारण तरीका बहुत प्रिय, मधुर प्रभावशाली होता है। आध्यात्मिक दिशा में शिष्य की विशेष प्रगति से गुरु बहुत प्रसन्न होता है। शिष्य की यथोचित प्रशंसा के द्वारा गुरु, शिष्य के उन आध्यात्मिक गुणों को स्थायी रूप देता है, जिन्हे वह प्राप्त कर रहा हो, तथा भविष्य में किसी भी परिस्थिति का सामना कर सकने का उसमें आत्म-विश्वास पैदा करता है। किसी उदात्ता भाव का उद्रेक, आत्म विसर्जन का भाव, वीरोचित बलिदान असाधारण धैर्य, प्रेम या श्रध्दा को प्रकट करने वाली घटना इन में से कोई भी बात गुरु को प्रसन्न करने तथा उनकी निर्मल प्रशंसा प्राप्त करने के लिए पर्याप्त है; और वे शिष्यों के सदगुणों को देखकर प्राय: उन सदगुणों को प्रोत्साहित करने तथा स्थायी रूप देने के लिए शिष्यों की प्रकट रूप से प्रशंसा करते है। शिष्य गुरु की प्रशंसा की कीमत करने लगता है; और अन्य किसी की अपेक्षा गुरु की स्वीकृति से उसे अधिक आनन्द प्राप्त होता है। किसी दूसरी अवस्था में शिष्य के लिए जो करना असम्भव होता है, वह उस कार्य को सिर्फ यह जान कर करने में समर्थ होता है, कि उससे गुरु खुश होंगे। गुरु को प्रसन्न करने के लिये, वह कठिन से कठिन कष्ट झेलने के तथा बड़े से बड़े लोभ का सहर्ष संवरण करने के लिए तैयार रहता है।

सभी समस्याओं का हल
चूँकि गुरु जिज्ञासु के लिए सर्वव्यापी आत्मा का एक प्रतीक होता है, अत: गुरु के प्रति अपने आपको यथोचित, व्यवस्थित करने की उसकी समस्या, तथा अपने अंतरात्मा की अनुभूति करने एवम अन्य रूपों मे विद्यमान आत्मा के प्रति अपने आपका व्यवस्थित करने की उसकी समस्या में कोई भेद नहीं है। गुरु की भक्ति करके वह मानों इन सभी समस्याओं की मौलिक एकता को बोधपूर्वक हृदयंगम कर रहा है। और मानो मानसिक रणकौशल के दृष्टिकोण से वह उन्हें भिन्न भिन्न समस्या समझ कर एक दूसरे से अलग कर के उन्हें नहीं सुलझा रहा है। अत: वह विरोधी दावों के बीच कोई अस्थायी समझौता नहीं कर रहा है, किन्तु सच्चे समन्वय की ओर अग्रसर हो रहा है। इस समन्वय की प्राप्ति में शिष्य की सहायता करने के लिए गुरु को शिष्य के समस्त आदर्शवाद का आश्रय केन्द्र बनना पड़ता है, क्योंकि उसके लक्ष्य के बीच के व्यवधानों को छिन्न-भिन्न करने के लिए अंत:करण कि शक्तियों की अनन्त एकाग्रता आवश्यक है।

गुरु का सर्वश्रेष्ठ दावा
अपने गुरु के अतिरिक्त अन्य दूसरे गुरुओं के प्रति भी शिष्य स्वाभाविक रूप से सम्मान अनुभव करेगा ही। किन्तु इससे उसके स्वयं के गुरु के दावे की सर्व-श्रेष्ठता न तो सीमित ही होती और न भंग होती है। सभी सिध्द गुरु ज्ञान में एक ही हैं। और उनके बीच श्रेष्ठता या अश्रेष्ठता का प्रतिपादन करना मिथ्या है। किन्तु यद्यपि इस दृष्टिकोण से एक गुरु दूसरे गुरु की अपेक्षा श्रेष्ठतर नहीं है, तथापि अपने ही गुरु को तब तक समझे जब तक वह द्वैत का अतिक्रमण्ा न कर ले। जीवन पर अनेक विरोधी दावे हैं। इन दावों में से यदि कोई एक दावा अत्यन्त होते देर न लगेगी। अतएव गुरु का अनन्य ध्यान अंत:करण की बिखरी हुई शक्तियों को इकट्ठा करने के लिए नितान्त आवश्यक है। कुछ बिरले प्रसंगो पर, कुछ विशेष परिस्थितियों के कारण, स्वयं गुरु किसी खास शिष्य से सम्बध्द कार्य में भाग लेने का निश्चय करे, अत: एक ही शिष्य का दो या अधिक गुरुओं से अनेषक्त होने के भी उदाहरण पाये जाते हैं। किन्तु यह कोई नियम नहीं है सिर्फ अपवाद है। और जब एक ही शिष्य के एक के अधिक गुरु होते है, तो वे ऐसी सावधानी के साथ, शिष्य के कार्य का विभाजन कर देते हैं, कि शिष्य विभिन्न दावों की खींचतान का शिकार नहीं होता।