एक बहुत बड़े हॉल में सेकड़ों की संख्या में वृध्द, स्त्री-पुरूष, बच्चे बैठे हैं, भजन गायिकों की मण्डली द्वारा भजनों की सुन्दर प्रस्तुति के कारण हॉल का वातावरण मधुर स्वरलहरियों से गुंजायमान है।
हॉल में बैठे सभी लोंगो की आंखे अजीब सी बोझिल है, हॉल के दूसरे सिरे पर बीचो-बीच एक मंच पर सिंहासननुमा कुर्सी पर साधारण कुर्ता-पायजामा पहने किन्तु घनी-घनी मूछों वाले रोबिल व्यक्तित्व के एक शख्स विराजमान हैं- चेहरे पर अलौकिक, तेज अंदाज में बेफिकिन्तु आंखो में समंदर सी गहराई तथा होशपूर्णता। मंद-मंद मुस्कान बिखेरते इन शख्स के शरीर से लगभग 3 से 10 वर्ष तक के कुछ बच्चे बुरी तरह लिपटें या कहें कि उन्हे जकड़े हुऐ हैं। कुछ महिलाऐं एवं पुरूष इनके पैरो मे झुके तो कुछ आस-पास जमीन पर लोट-पोट हो रहे हैं।
तबले की थाप और हारमोनियम की मस्त धुन के साथ भजन की स्वरलहरियों के बीचोबीच अचानक सामने बैठी महिला की जोरदार चीख वातावरण में गुजती है और फिर उसकी निरंतर चीखो का सिलसिला शुरू हो जाता है। एकाएक मंच के नीचे बैठी महिला जोरदार अट्टाहस के साथ खड़ी होकर ठीक वैसे ही झूमती नजर आती है जैसे कि तेज ऑंधी में कोई वृक्ष झौंके लेता है। तभी हॉल के बीचो-बीच बैठे एक युवक की सांसे धौकनी के मानिद तेज गति से चलने लगती है। एक काफी वजनी शरीर के मालिक जो सुखासन पर बैठे हुये यह दृश्य देख रहे थे अचानक उनकी आंखे बंद हो जाती हैं और वे उसी अवस्था में मेड़क की भांति आगे को फदकते हुये जाते है। फिर बिना किसी की सहायता के फुर्ती से आसन लगा लेते हैं। भजन गायकों के पास ही बैठे एक लगभग 75 से 80 वर्ष के बुजुर्गवार जो ऑंख बन्द किये भजन का आनन्द ले रहे थे एकाएक उठ कर मदमस्त अंदाज में युवाओं की भांति थिरकने लगते हैं।
हॉल में उपस्थित अधिकांश लोग अलग-अलग प्रकार की क्रियाओं में मग्नरत होकर वातावरण को विचित्रता प्रदान कर रहे हैं या फिर बन्द तथा सिर इस प्रकार झुके या गर्दन के सहारे से आगे की ओर लटके हुए है जैसे कि वे गहरी नींद के आगोश में हो।
भजन समापन की और है, मंच पर बैठे शख्स स्वयं से लिपटे बच्चों के सिर पर स्नेह पूर्वक हाथ फेरते हैं। उनके हाथ के पंजे, अंगूठे और तर्जनी को मिलाकर बनाई चिन्मयमुद्रा का रूप धारण किये हुये। बच्चे धीरे-धीरे शांत होते जाते हैं और उन्हें छोड़कर लगभग अर्ध्दबेहोशी की सी हालत में वहीं लेट जाते हैं। रोबिले व्यक्तित्व के वह शख्स उठकर खड़े हो जाते हैं। उनके चिन्मयमुद्रा युक्त दोंनो हाथ परस्पर विपरीत दिशा में हवा में आहिस्ता-आहिस्ता आसमान की ओर उठते जाते हैं, ऑंखो में नशीलापन, मुख से धीर-गंभीर आवाज में अनादि शब्द ''ओउम'' का प्रभावकारी स्वर चारों ओर गूंज रहा है।
एकाएक चिन्मयमुद्रा युक्त हाथ के पंजे का इशारा जोर-जोर से चीख मारती हुई महिला की ओर होता है, चीखें मन्द होती हुई धीरे-धीरे शांत हो जाती है और महिला फर्श पर बिछे गददे पर लुढक जाती है। दूसरा इशारा नृत्यरत बुजुर्ग सज्जन की ओर - थिरकते पैरो की लय में धीमा पन आ जाता है। वे रौबिले शख्स मंच से उतरकर धीरे-धीरे नीचे आते हैं। अटटाहस करती महिला के सिर पर स्नेहीयुक्त हाथ का कोमल स्पर्श-अटटाहस मंद होकर सिसकियों में परिवर्तित हो जातें है। महिला अब उनके पैरों में लिपटी है।
धौंकनी की भांति सांसे ले रहे युवक के भौंहो के मध्य के ठीक उपर चिन्मयमुद्रा युक्त हाथ की मध्यमा उँगली का अलौकिक स्पर्श-सांसो की गति सामान्य स्थिति को प्राप्त होने लगती है। भजन अब तक समाप्त हो चुका था , कुछ क्षणों बाद दूसरा भजन शुरू होता है कि अचानक पूर्व में चीखे मार रही महिला की पुन: जोरदार चीख गूंजती है, तेज गति से वृत्ताकार चक्कर खाकर वह पूरे वेग के साथ जमीन पर गिरती है इसके पहले चिन्मयमुद्रा युक्त दो हाथों ने उसे हवा में ही संभाल लिया, बुजुर्ग के नृत्यरत पैर पुन: गतिमान होने लगे तथा युवक की सांसो में फिर से तीव्रता उत्पन्न हो गई।
किसी भी अजनबी व्यक्ति के लिये प्रथम बार यह दृश्य हतप्रभ कर देने वाला साबित हो सकता है किन्तु र्इ्रश्वर प्रेम, आध्यात्म जगत एवं आत्मशक्ति की सत्ता का वर्चस्व स्वीकार करने वालों के लिये यह दृश्य ईश्वरीय प्रेम की निर्बाध प्रवाहित सरिता है।
दूसरा दृश्य
एक 7 - 8 वर्षीय बालक अपने घर में बंधी गाय के बछड़े को प्रतिदिन अपनी माँ के दूध के लिये रभाते देखता है। बछड़े का यह दु:ख उससे रोज-रोज बर्दाश्त नहीं होता ओर एक दिन घर वालो की नजर बचाकर वह चुपचाप बछड़े को अपनी माँ का दूध पीने के लिये खोल देता है। बछड़े को दुग्धपान करते देख बालक मन को असीम शान्ति मिली और यह चोरी-छिपे का खेल उसका रोज का नियम ही बन गया। लेकिन चोरी कब तक छिपती, एक दिन पकड़ी गई, सजा भी मिली किन्तु बालक मन में एक कसक पैदा हो गई कि जिस दूध का हकदार वह बछड़ा है उस दूध का प्रयोग दूसरे लोग कर रहें है। यह टीस उसके कोमल मन पर गहरा असर कर गई और उसी दिन इस नन्हें से बालक ने यह कठोर संकल्प लिया कि वह आजीवन दूध एवं दूध से निर्मित किसी भी पदार्थ का सेवन नहीं करेगा। और फिर नन्हीं सी उम्र का यह संकल्प जीवन भर का नियम बन गया। छोटी सी उम्र में चटटानी इरादे रखने वाले इस अदभुत बालक का नाम था- रघुवीर । अपनी अविचल इच्छाशक्ति की कठिन परीक्षा लेते जीवन भर दूध व दूध से निर्मित प्रत्येक पदार्थ का सेवन त्याग कर अपने संकल्प को अखण्डित रखने वाला यह अद्भुत बालक रघुवीर, प्रथम दृश्य में हाथों के पंजो की चिन्मयमुद्रा का किसी रिमोट की भांति प्रयोग कर अपने भक्तों को मनातीत ध्यान के अथाह समुद्र में गोते लगवाने वाले अलौकिक तेज युक्त, अवतार मेहेर बाबा प्रेमी तथा विश्व आध्यात्मिक संस्थान के संस्थान के संस्थापक सदगुरुदेव आचार्य डॉ. रघुवीर सिंह गौर के रूप में अवतरित आध्यात्मिक प्रकाश पुंज अपने भक्तों को मनातीत ध्यान की अलौकिक दुनियां, जहां ''अस्तित्वहीन अस्तित्व'' की अवस्था में मन अवस्थित होता है, में पहुँचाकर उसे ईश्वर प्रेम तथा आत्म साक्षात्कर की दुर्लभ स्थिति का अनुपम अहसास कराते हुये उसकी आध्यात्मिक चेतना को जागृत कर सदगति की ओर ले जाने तथा प्राणी सेवा का बीड़ा उठाकर अपने संपूर्ण जीवन को समर्पित करने वाली यह सख्सियत आज आध्यात्म की परिभाषा का एक अनोखे अंदाज में आगाज कर रही है।
मध्यप्रदेश स्थित देश की पर्यटन नगरी एवं सिंधिया राजवंश की ग्रीष्मकालीन राजधानी शिवपुरी की एक पुरानी जागीरदारी, ''खौकर'' के जागीरदार थे ठाकुर बादाम सिंह गौर। कालांतर में ठाकुर साहब शिवपुरी जिले में शिवपुरी जिले में शिवपुरी शहर से लगभग 17 कि.मी. दूर कोटा (राजस्थान) मार्ग पर स्थित ग्राम बेंहटा में आ बसे।
वह अमावस की घनी अंधियारी रात थी, बेंहटा के ग्रामीणजन काम-धन्धे से निपट कर भोजन इत्यादि से निवृत हो रहे थे कि एकाएक गांव का प्रत्येक घर जैसे चांदनी से नहा गया, ऐसा लग रहा था कि पूर्णमासी का चांद हर घर में उतर आया हो। सभी लोग कौतहूलवश इस अलौकिक प्रकाश का कारण पता करने लगे, तभी खबर आई कि ठाकुर बादाम सिंह को प्रथम पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है लोग-बाग ठाकुर साहब को बधाई देने पहुंचे, दादी की गोद में किलकारी मार रहे बालक को देखकर सभी दंग रह गये। इस नन्हें से बालक के मुखमण्डल पर एक अवर्णनीय तेज प्रकाशित था, ग्रामीणजन ठाकुर साहब के भाग्य को सराहने लगे। बालक साधारण नहीं था। यह बात ईश्वर के प्रति अगाध श्रध्दा रखने वाले ठाकुर दम्पत्ती को भलीभांति समझ आ गई थी। बालक का नामकरण संस्कार हुआ। ''रघुवीर''। समय का चक्र अपनी गति से घुमता रहा, यथानाम तथा गुण वाली कहावत चरितार्थ करते प्रखर बुध्दि एवं अदभुत प्रतिभा के धनी रघुवीर स्कूल जाने लगे, अपने गुणों के कारण स्कूल में भी आकर्षण का केन्द्र बन गये । एक दिन अपनी एक सहपाठिन को रोते हुये देखा तो कारण पता लगा कि उसकी आर्थिक हालत बहुत नाजुक है तथा आग की पढ़ाई-अर्थाभाव से सम्भव नहीं है, बोले - ''तुम चिन्ता न करो, तुम्हारे इस भाई के रहते तुम्हे कोई कष्ट नही होगा''। तत्पश्चात रघुवीर ने काम ढूंढना शुरू किया, जो भी काम मिला किया, मेहनत से पैसे जोड़-जोड़कर अपनी उस गरीब बहन की मदद करते रहे।
उनकी कार्यशैली पर उनके शिक्षक भी आश्चर्य प्रकट करते थे, लेकिन रघुवीर के कक्षा अध्यापक पं0 शालिगराम शर्मा उनकी आध्यात्मिक शक्ति को पहचान गये और उन्होने इस अदभुत बालक को अपना गुरु मानते हुये उससे आध्यात्मिक दीक्षा गहण कर ली, इस समय रघुवीर कक्षा-4 के विघार्थी थे। जब रघुवीर 7वीं में पहुंचे तो विघालय के प्राचार्य श्री बटेश्वरदयाल श्रीवास्तव भी उनके अलौकिक गुणों से प्रभावित होकर उनके शिष्य बन गये, श्रीवास्तव जी के पश्चात आये प्राचार्य ठाकुर रामरक्षपाल सिंह ने भी इनसे आध्यात्मिक दीक्षा ली ।
बालक रघवीर ने 7 वर्ष की उम्र में पूज्यपाद स्वामी रामगिरी महाराज के चरणों में स्वयं को शिष्य के रूप में समर्पित कर दिया तथा इसके पश्चात आध्यात्मिक ज्ञान का शुरू हुआ सफर अपने विकास की ओर अग्रसर होता गया। 14 वर्ष की अवस्था मे रघुवीर हिमालय क्षेत्र में टेहरी गढ़वाल में जाकर साधनारत हो गये। तत्पश्चात तिब्बत में लामा संतो के सानिध्य में तपस्या करने चलें गये।
पूज्यपाद स्वामी जी महाराज दतिया के सानिध्य में जब रघुवीर आये तो स्वामी जी के निर्देश पर पीताम्बरा पीठ दतिया, कामख्या पीठ आसाम तथा भिन्न-भिन्न महान संतो, परमहंसो का सानिध्य उन्हें प्राप्त हुआ जिनमें-परमहंस बाबा बजरंगदास महात्यागी, सेगाड़े वाले परमहंस, ओम सरकार, महायोगिनि माँ परमसिदधा प्रमुख हैं।
किशोर रघुवीर ने युवा अवस्था में कदम रखा तो ठाकुर साहब ने उनका ब्याह करा दिया तब तक उनकी पढ़ाई भी समाप्त हो चकी थी, उन्होने कानून की शिक्षा प्राप्त कर डॉक्टरेट की उपाधि हासिल कर ली थी। किन्तु मन में करूणा, प्रेम, दया तथा प्राणी-सेवा भावना का जो बीच अंकुतित हुआ था, उसका कायांतरण एक विशाल वृक्ष के रूप् पें हो चुका था। मन में अडिग इच्छा शक्ति की प्रवाहित सरिता के स्थान पर फॉलादी इरादों का समंदर ठाटें मार रहा था।
एक दिन अहेतुकी कृपा के माध्यम से वर्तमान युगावतार अवतार मेहेर बाबा के अलौकिक दर्शन एवं सानिध्य को प्राप्त कर विश्व व्यापी कल्याण्कारी कार्यक्रमों मूर्त रूप देने के लिये अवतार मेहेर बाबा के कार्यो एवं निर्देशों का अक्षरस: पालन करते हुऐ ''विश्व आध्यात्मिक संस्थान'' की स्थापना कर इसके माध्यम से जन चेतना के विकास का संकल्प लिया।
विश्व कल्याण हेतु ट्रस्ट के उददेश्य निर्धारित किये गये- आध्यात्म, ध्यान, योग एवं चिकित्सा द्वारा मानव चेतना का विकास कर उसे आत्म साक्षात्कार कराना ताकि वह आत्मशुध्दि के साथ विश्व कल्याण में भागीदार बन सके, मानव का मानसिक एवं शारीरिक विकास करना, प्रकृति एवं प्राणियों को अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराना, समाज की उन्नति के लिये योग्य संतति पैदा करने के उपायों को सुनिश्चित करना एवं नवदंपत्तियों का मार्गदर्शन करना, दाम्पत्य जीवन का सुखी एवं आनंदित बनाने के लिये सहयोग एवं मार्गदर्शन, उपरोक्त उददेश्यों को प्राप्त करने के लिये देश-विदेश में ध्यान साधना केन्द्रों की स्थापना एवं संचालन तथा आदर्श शिक्षा हेतु विघालयों, महाविद्यालयों की स्थापना, उत्तम स्वास्थ्य हेतु चिकित्सालयों , चिकित्सा महाविद्यालयों की स्थापना जैसे लोक कल्याणकारी उददेश्य बना कर संस्थान ने अपनी गतिविधियां प्रारंभ की। मुख्य संस्थापक न्यासी सदगुरुदेव आचार्य डॉ0 रघुवीर सिंह गौर के मार्गदर्शन में संस्थान ने बहुत कम समय मे अपनी कार्यशैली द्वारा उददेश्यपूर्ति हेतु प्रशंसनीय कार्य सम्पन्न किये। संपूर्ण कार्यो की श्रंखला मध्यप्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, केरल, उत्तरप्रदेश तथा महाराष्ट तक कार्यशील हो गई। अपाहिजों, असहायों, निराश्रतों, दीन-हीनों तथा मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगो के लिये देश के 12 शहरों में प्रतिदिन लंगर द्वारा भोजन उपलब्ध कराया जाता है। भविष्य में सम्पूर्ण मध्यप्रदेश तथा भारत वर्ष मे यह लंगर योजना लागू करने का विचार प्रस्तावित है। संस्थान द्वारा असहाय एवं गरीबो के लिये आयोजिम नि:शुल्क चिकित्सा शिविरों में हिन्दुस्तान के ख्यातिप्राप्त चिकित्सकों द्वारा रोगों का निदान एवं उपचार किया जाता है। निर्धन विधार्थीयों की सहायता, तथा गरीबों एवं पिछड़े लोगो की बस्तियों में जा-जाकर उनकी सहायता एवं उपचार संस्थान का अहम नियम बन चुका है और सदगुरुदेव आचार्य डॉ0 रघुवीर सिंह गौर अपने भक्तों एवं उनुयायियों के प्रिय ''गुरुजी''।
दृश्य एक में भजनों की धुन पर ''गुरुजी'' के रिमोट के इशारे पर मानव शरीर पर घटित क्रियाऐं उनके अनवरत ध्यान कार्यक्रमों का एक हिस्सा है। आमतौर पर ''ध्यान'' शब्द का उल्लेख होते ही मन मे ऑंख बंद कर सुखासन अथवा पदमासन मे बैठे हुये दृश्य की कल्पना उभर कर सामने आती है फिर हॉल मे जो गुरु जी के सम्मुख घटित हो रहा था, वह क्या था ? इस प्रश्न पर गुरुजी के मुखमण्डल पर वही चिरपरिचित मुस्कान तैर जाती है -
''बूंद समायी सिंधु मे यह जानत सब कोय,
सिंधु समाया बूंद मे गिरला जाने कोय।''
अब इसका वर्णन कैसे किया जा सकता है, यह तो अनुभव करने की बात है जिस पर घटित होता है। वही समझ सकता है।
दिल्ली की प्रसिध्द पत्रकार ''सुप्रिया रॉय'' ने इस अनुभव को कभी न खत्म होने वाला अनुभव लिखा है। अपने शिवपुरी प्रवास के दौरान अपने पत्रकार मित्र आलोक इन्दौरिया के कहने पर जब वह गुरुजी से मिली तो प्रथम मुलाकात मे ही उन्हे इस अलौकिक अनुभव की अनुभूति हुई- ''हवा में तैरते अनादि स्वर ओउम के उच्चारण के बीच सांस अपनी पूरी यात्रा कर नाभि तक पहुंचने लगी तथा ऐसा लगा कि मैं हवा की गहराइयो में विलीन हो रही हूँ, पहले आसपास की दूनिया फिर आवाजें और अंतत: सब कुछ हल्का होते-होते विलीन हो गया। ध्यान की एक संध्या ने मेरी दिशा ही बदल दी, अब मुझे ध्यान के लिये गुरुजी की जरूरत नही पड़ती, जब, जहां चाहे ध्यान की समाधि मे जाकर थकान व मानसिक उदिवग्नता को मैले कपड़ो की तरह किसी सरोवर मे छोड़ कर चली जाती हूँ''
ध्यान और समाधि की इस अलौकिक स्थिति का अनुभव आखिर कैसे संभव है? गुरुजी कहते है- आत्मा की तार्तवेक एकता ईश्वर के साथ होने से वह पूर्णता को प्राप्त करने हेतु चेतना के माध्यम से उत्तरोत्तर ब्राह्मी अवस्था में अवस्थित होने का प्रयास करती है और पूर्णता प्राप्त होने पर अनलहक अथवा ''अहम ब्रह्मास्मि'' की अवस्था हो जाती है। चेतन तत्व मे यह यात्रा ज्ञात रूप् में तथा अचेतन तत्व मे यह यात्रा अज्ञात रूप मे निर्बाध गति से चलती रहती है। इसका लक्ष्य सुख,चैन, आत्मतृप्ति, आत्म साक्षात्कार, मोक्ष, परमगति अथवा ब्रहम साक्षात्कार होने के लिए निर्धारित करते है। अत: इस अवस्था क मध्य उन्हें संतुष्टि दिव्यता के क्षण प्राप्त होते हैं, जिन्हे वह स्थाई बनाने के लिये सचेतन अथवा अचेतन रूप से प्रयत्नशील रहता है। इस यात्रा में चेतना के विकास हेतु जितने भी प्रयत्न किये जाते है, अनमे सदगुरू की कृपा, उनके द्वारा निर्देशित मार्ग, साधक को जीव से ब्रह्म भाव में रूपांतरण करने के लिये श्रेष्ठतम आलंबन है।
सदगुरु की प्राप्ति कैसे संभव है, गुरुजी बताते है- ''साधक अपने पूर्व संचित संस्कार वर्तमान परिवेश, वातावरण और ज्ञान के फलस्वरूप सदगुरु की प्राप्ति करता है। मानव जीवन मे सदगुरु ही चेतना के विकास में अंतिम सोपान होता है, क्योंकि उसके द्वारा प्रतिपादित मार्ग, सदमार्ग होता है, और साधक का श्रेष्ठतम हित उसमें सन्निहित रहता है। जैसा कि सदगुरु को ब्रह्मा, विष्णु, महेश पद से विभूषित कर उसे साक्षात पार ब्रह्म निरूपित किया जाता है , अत: उसके द्वारा साधक का रूपांतरण साधक-साधिकाऐं हुऐ है, उनके मूल में सदगुरु की कृपा अवश्य रही है। बगैर सदगुरु कृपा प्राप्त किये कोई भी साधक ब्रह्म भाव को उपलब्ध नही हो सकता है। प्रत्येक देश काल में सदगुरु अपनी उपस्थिति से जनमानस की चेतना को आध्यात्मिक पथ पर निरंतर अग्रसर करते रहते है।''
ध्यानवस्था के दौरान घटिया क्रियाओं के संबंध में गुरुजी का कथन है- ये वे यौगिक क्रियाऐं है जो देह के पांचो तत्वो का संतुलन बनाती है जिसमें जो तत्व प्रबल होगा वह अपनी अतिरिक्त उर्जा को क्रियाओं के रूप में खर्च करेगा। संचित संस्कारो का विसर्जन देह के माध्यम से विभिन्न क्रियाओं के रूप मे होता है।
इन यौगिक क्रियाओं को आप चिन्मय मुद्रा युक्त हाथ से रिमोट की भांति कैसे नियन्त्रण करते है ? धीर-गंभीर चेहरे पर वही चिरपरिचित मुस्कुराहट तैर जाती है - ''साधक जब समाधि की अवस्था मे अवस्थित होता है तो एक समाधि मे मै भी रहता हूँ तथा ऐसी स्थिति मे महामाया कुण्डलिनी के माध्यम से मैं साधक के साथ सीधे सम्पर्क मे रहता हूँ और जब मुझे ऐसा लगता है कि एक नीयत क्रिया को दूसरी मे परिवर्तित करना उचित होगा तो मैं वैसा करने की इच्छा मन मे प्रकट करता हूँ और ब्रह्माण्डी उर्जा के आदान-प्रदान द्वारा सब खुद-ब-खुद घटित हो जाता है।'' गुरुजी के मुख से यह सब सुनना जितना सुखद एवं सहज लगता है, सदृश्य देखना उतना ही हैरत अगेज भी । शक्तिपात की इस विलक्षण प्रक्रिया से एक बार गुजरने के पश्चात भुक्तभोगी को वर्णन करने के लिये शब्द ढूंढने पड़ सकते है।
अवतार मेहेर बाबा के परम प्रिय प्रेमी डॉ0 जी0एन0एस0 मूर्ति जिन्हें बाबा ने अपना विवेकानंद कहा था जिनके साहित्य की प्रशंसक श्री विष्णुकांत शास्त्री, डॉ0 एस0 राधाकृष्णन, डॉ0 जाकिर हुसैन, पं0 जवाहरलाल नेहरू, रेमण्ड फिटजेराल्ड जैसी हस्तिया रही, जब शिवपुरी आये तो स्थानीय पत्रकारों द्वारा गुरुजी के विषय मे पूछे गये एक सवाल के जबाब मे इस विख्यात आध्यात्मिक शख्तियत का जबाब था- ''आचार्य डॉ0 आर0एस0 गौर, ही इस फर्स्ट ऑरीजनल फाउण्डर ऑफ दिस सुप्रामेण्टल मेडीटेशन '' (आचार्य डॉ0 आर0एस0 गौर वह इस मनातीत ध्यान के प्रथम मूल संस्थागक है) स्त्री-पुरुष, बच्चों पर समान भाव से घटित ध्यान की क्रियाओं के विषय में गुरूजी का दृष्टिकोण बिल्कुल साफ नजर आता है - यह सब जाति, उम्र तथा लिंग के बंधनो से परे विषय है तथा इसके लिये परम आवश्यक हैं मन की सहजता, सरलता तथा सदगुरु के प्रति सच्ची श्रध्दा एवं आत्मसमर्पण । फिर वही मरमोहक मुस्कुराहट- जब तक मन रूपी स्लेट कोरी होगी तब तक आत्मिक उपलब्धि संभव नही अत: पहले सहज, सरल बने ताकि सदगुरु मन रूपी स्लेट पर संस्कार रूपी इबारत का पूर्णत: साफ कर सके । चेतना पर छायी संस्कार रूपी धूल सदगुरु की असीम अनुकम्पा से ही साफ होकर साधक को परमहंस भाव में अवस्थित करती है।
क्या आध्यात्म सांसारिक अथवा भौतिक जीवन के प्रति नकारात्मक सोच या वैराग्य की भावना है? नही, बिल्कुल नही ठोस प्रतिवाद- सांसारिक जीवन तथा दैनिक कार्यो के प्रति निष्क्रियता एवं गैर जिम्मेदाराना रवैया आध्यात्म नही है, आध्यात्म जीवन रहितता अथवा जीवन के प्रति नकारात्मक सोच नही वरन सर्व खलविदम ब्रह्म नामक विचार को अपनाते हुए सकारात्मक , आनंदमय एवं प्रेम सहित जीवन जीना है।
अवतार मेहेर बाबा द्वारा प्रणीत मूलमंत्र ''सेवकाई मे प्रभुताई'' को गुरुजी आध्यात्मिक उन्नति के लिये भी मूलमंत्र मानते है, और इसी के पालनार्थ विश्व आध्यात्मिक संस्थान का गठन किया गया। मानव जीवन के संपूर्ण विकास हेतु कटिबध्द वह संस्थान अपने नाम के अनुरूप विश्वव्यापी नेटवर्क तैयार कर रहा है ताकि जो जहां है उसे वही लाभ पहुंचाया जा सके, इसके लिये संस्थान अपनी वेबसाइट वर्ल्ड स्पीरियल फाउन्डेशन डॉट कॉम के द्वारा भी प्रसार कर रहा है। उपयोगी आध्यात्मिक साहित्य की रचना कर प्रत्येक देश की भाषा में अनुवादित कर उसे प्रत्येक देश की भाषा में अनुवादित कर उसे वहां की स्वयंसेवी संस्थाओ को उपलब्ध करायेगा।
अपने बचपनों के कठिन संकल्पो की अग्नि मे तपाकर निखर गये कुंदन की भांति आचार्य डॉ0 गौर साहब आज सदगुरु के रूप् मे अपने आभा मण्डल के सानिध्य मे अपनी शरण मे आने वालो और जो ना आये हो उन्हे भी ईश प्रेम पाश मे बांधकर सदगति के मार्ग पर अग्रसर कर रहे है जहां मनुष्य की चेतना के अर्जनकाल में संचित कर लिये संस्कारो को निकाल कर उसे सनातन स्वरूप मे अवस्थित कर सतचित आनंद की दिव्य अनुभूति का साक्षात्कार प्राप्त होता है।
गुरुजी के परमप्रिय शिष्य, भारत सरकार द्वारा पदमभूषण से सम्मानित नेताजी सुभाषचंद्र बोस के साथी तथा उनकी सेना आजाद हिन्द फौज के कर्नल , श्री जी0एस0ढिल्लन से जब गुरुजी के विषय मे बात करनी चाही तो कुछ देर सोचते हुऐ बोले उनके (गुरुजी) विषय में कुछ कहने से पहले मुझे कुछ वक्त दीजिये । फिर मंद मुस्कान के साथ- उनमें एक ऐसी कशिश है जो मुझे उनके समीप बरबस खींच कर ले जाती है। मैं जानता हूँ कि वे एक बहुत बड़ी आध्यात्मिक शक्ति है, उनके विषय में कुछ भी कहना कठिन है हालांकि उनके विषय में बहुत कुछ कहा जा सकता है।
शिवपुरी में पोहरी रोड़ स्थित अपने शिष्य डॉ डी0के0सिरोठिया के निवास लार्ड मेहेर में प्रतिदिन अपने भक्तों पर अमृत वर्षा करते हुऐ सदगुरुदेव डॉ0 गौर साहब अपने भक्तों के साथ परस्पर मित्रवत भाव कायम किये हुऐ है।
साधक को आत्म साक्षात्कार हेतु गुरुजी किसी भी धर्म अथवा ईश्वर विशेष या फिर पूजा पध्दिति पर जोर नहीं देते हैं- मन को सहजता - सरलता के साथ जहां लगे लगा दीजिये, बाकी ईश्वर एवं प्रकृति पर छोड़ दीजिये, वह अपना कार्य स्वयं कर लेगी।
बकोल सुप्रिया रॉय- समकालीन रातनैतिक भाषा में कहें तो गुरुजी धर्मनिरपेक्ष है। उनका धर्म किसी ईश्वर अथवा विशेष पूजा पध्दति से नहीं जुड़ा है और यही अखण्ड सत्य है कि प्राणी सेवा को अपना लक्ष्य बना कर प्रारंभ हुई यह विश्व कल्याणकारी यात्रा को अपना उददेश्य मानने वालों के लिये समस्त धर्म उनके अपने हैं।
समय गवाह है कि अवतार पुरूष तथा सदगुरु मानवता का पाठ पढाने नहीं बल्कि जगाने के लिये अवतरित होते हैं, लेकिन यह बात कहने में ही आसान है क्योंकि अज्ञान और सांसारिक भ्रम निद्रा में लीन समाज का जगाने या झकझोरने पर अवतारों को सदैव दर्ुव्यवहार अथवा सूली तक का सामना करना पड़ा किन्तु इन बातों से भी अपरिवर्तनीय वे अपनी करूणा, दया अनंत क्षमावान के साथ सब कुछ हंसते हुये मान-अपमान, सुख-दु:ख, हानि-लाभ से परे मानव एवं विश्व कल्याणकारी लक्ष्य पर चलते रहे।
हे ईश्वर इन्हे क्षमा करना, ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं -
यह शब्द सिर्फ अवतार एवं सदगुरु के ही हो सकते हैं और यही सच्चा सदगुरुत्व है।