जो सदगुरु,या ईश्वर पुरुष विकास क्रम से सर्व प्रथम निकला तथा अन्य बध्द जीवात्माओं की जिसने सहायता की तथा जो सहायता करता है, वह अवतार कहा जाता है। साधारण तथा अवतार में एक अन्तर और भी है । जब सद्गुरु संसार के लिए कार्य नहीं करता तो उसका मन अनन्त की ओर पुन: प्रवृत्ता होता है और संसार में अवतरित होना उसके लिए बड़ा कठिन हो जाता है। ऐसे प्रसंगो पर वह अपने मन को सांसारिक वस्तुओं तथा कार्यो की ओर प्रवृत्ता होने के लिए बाध्य करता है। ऐसे अवसरों पर कुछ सद्गुरु भोजन की इच्छा प्रकट करते है। अपने बाल खींचते है या स्वयम् को थप्पड़ मारते हैं ताकि उन्हे शरीर बोध रहे, अवतरित होने के लिए उन्हे कोई ऐसी शारिरिक क्रिया आवश्यक होती है। किन्तु संसार सम्बन्धी किसी विशष कार्य में न लगे रहने पर भी अवतार को अपनी सामान्य चेतना कायम रखने में किसी कठिर्नाई का अनुभव नहीं होता। अवतरण के लिये अवतार को शारिरिक क्रियाओं का आश्रय नहीं लेना पड़ता ।
चेतना के मौलिक लक्षणों तथा सृष्टि में उसके होने वाले कार्य के प्रकार के दृष्टि कोण से अवतार अन्य सदगुरुओं या ईश्वर पुरुषों की ही तरह होता है। सान्त तथा सीमित मन न तो अवतार का होता है और न सद्गुरु का क्योंकि अनन्त में मग्न होने के अनन्तर उसका मन सार्वलौकिक हो जाता है। सृष्टि सम्बन्धी सभी प्रकार के कार्यो में लगे रहने पर भी सालिक या सद्गुरु या ईश्वर-पुरुष तथा अवतार एक क्षण के लिए भी सालिक या सदगुरु या ईश्वर ज्ञान नहीं खोते तथा जब दूसरी आत्माओं की सहायता करने की उनकी इच्छा होती है तब वे दोनो सार्वलौकिक मन के ही द्वारा कार्य करते है क्योंकि सार्वलौकिक मन उन्हीं का होता है।
ज्यों ज्यों मनुष्य आंतरिक भूमिकाओं का अतिक्रमण करता जाता है, तथा ईश्वरानुभूति की ओर अग्रसर होता जाता है त्यों त्यों वह क्रम क्रम से स्थूल सूक्ष्म तथा मानसिक संसार एवम् अपने स्थूल, सूक्ष्म तथा मानसिक शरीर के प्रति अचेतन होता जाता है। किंतु ईश्वरानुभूति के पश्चात् कतिपय अपने स्थूल, सूक्ष्म तथा मानसिक शरीर से चेतन होते हैं। इस अवरोहण तथा अवतरण से उनकी ईश्वर चेतना में कोई विकार नहीं आता। ऐसे पुरुष ईश्वर पुरुष कहलाते हैं। ईश्वर, स्वयंमेव ईश्वर की हैसियत से, चेतना पूर्वक मनुष्य नहीं होता, तथा मनुष्य की हैसियत से, चेतना पूर्वक ईश्वर नहीं होता। किन्तु ईश्वर पुरुष चेतना पूर्वक ईश्वर भी होता है तथा मनुष्य भी होता है।
सृष्टि की चेतना प्राप्त करके भी,ईश्वर पुरुष की ईश्वर चेतना में लेश मात्र भी विकार या अन्तर नहीं आता । आध्यात्मिक दृष्टिकोण से सृष्टि की चेतना स्वयमेव किसी भी प्रकार घातक नहीं है, घातक है संस्कारों के कारण चेतना का सृष्टि प्रपंच में फँस जाना । चेतना जब सृष्टि से इस प्रकार आसक्त हो जाती है तो वह परिणामत: अज्ञान से आच्छादित हो जाती है। उसके अज्ञानाच्छन्न हो जाने के कारण आभ्यंतर दिव्यत्व का उसे ज्ञान नहीं हो पाता। इसी भाँति आध्यात्मिक दृष्टिकोण से शरीर की चेतना स्वयमेव घातक नहीं है, घातक है संस्कारों के कारण चेतना का शरीर से आसक्त हो जाना तथा उससे तादात्म्य अनुभव करना। इस आसक्ति के फल-स्वरूप उस परमात्मा की अनुभूति नहीं हो पाती जो एकमात्र अद्वितीय सत्य है, जो सकल सृष्टि का आधार है तथा जो समूचे सृष्टि प्रपंच का सारगर्भित रहस्य है और जिस परमात्मा के ज्ञान से ही सृष्टि का यथार्थ मर्म जाना जा सकता है।
जीवात्मा संस्कारों की श्रृखला के द्वारा रूपों की दुनिया से बंध जाती है। संस्कार भ्रम पैदा करते हैं और भ्रम के कारण आत्मा अपने को शरीर से युक्त कर लेती है अर्थात अपने को शरीर समझने लगती है। चेतना की आन्तरिक अशान्ति तथा इच्छा की विकृति केवल शरीर की चेतना के कारण उत्पन्न नहीं होती है किन्तु चेतना की शरीर से सांस्कारिक आसक्ति हो जाने के कारण उत्पन्न होती है।