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राम पादुका वन चलें, कृष्ण लकुटिया ग्वाल। |
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ईश्वर प्राप्त पुरुषों को न केवल ईश्वर चेतना ही होती है। बल्कि सृष्टि की तथा अपने शरीर की भी चेतना होती है। वे बध्द जीवात्माओं में सक्रिय सहानुभूति रखते है तथा दूसरे बध्द आत्माओं को ईश्वर की ओर उन्नति करने में सहायता पहुँचाने के लिए सृष्टि में कार्य करने के लिये वे अपने स्वयम् के शरीर का ज्ञान पूर्वक उपयोग करते हैं। ऐसी ईश्वर प्राप्त आत्मा को सालिक, सदगुरु या ईश्वर पुरुष कहा जाता है। सालिक या सद्गुरु समस्त सृष्टि का केंद्र होता है और ऊँच नीच, अच्छे बुरे सभी प्राणी उससे समान दूरी पर रहते हैं। सूफी पंरपरा के अनुसार यह केंद्र कुतुब कहलाता है। कुतुब अपने प्रतिनिधियों के या नियुक्त कार्यकर्ताओं के द्वारा समस्त सृष्टि का संचालन करता है।
गुरू श्रध्दा के बिना घटता ही
नही, क्योंकि श्रध्दा की आंख से ही देखा जा सकता है। और गुरू और शिष्य के बीच जो संबंध है वो विचार का नहीं है, वो श्रध्दा का है, वो प्रेम का है। वो अत्यंत आत्मीय संबंध है। उससे बडा आत्मीय कोई संबंध जगत में नहीं है। पति-पत्नि का संबंध भी आत्मीय नहीं है। बाप-बेटे का संबंध भी आत्मीय नहीं है। भाई-भाई का संबंध भी आत्मीय नहीं है। फासले है, क्योंकि सारे संबंध शरीर के है। तुम्हारे पिता, तुम्हारे पिता है। क्योंकि उनके शरीर से पैदा हुए हैं, और क्या संबंध है ? ये संबंध सब शारीरिक है। इसमें आत्मा का क्या संबंध है ? एक ही संबंध है जो जगत में, जो शरीर का नहीं है, वो गुरू और शिष्य का संबंध है। उससे कोई संबंध शरीर का नहीं है। अससे संबंध आत्मा का है, और जिससे आत्मा का संबंध है, उससे ही परमात्मा की उपलब्धि हो सकेगी।
गुरू ज्ञान देता नहीं, तुम्हारे ज्ञान को छीन लेता है। गुरू तुम्हे भरता नहीं, खाली करता है। गुरू तुम्हे शून्य बनाता है; क्योकि शून्य में ही पूर्ण का आगमन हो सकता है। गुरू तुम्हें खाली करता है, ताकि परमात्मा के लिए जगह हो सके।
गुरू ऐसा आदमी है, जो तुम्हारी भाषा भी समझ सकता है; और एक तरफ से जिसका जीवन और प्राण परमात्मा में लीन हो गया। एक हाथ तुम्हारे हाथ में और एक हाथ परमात्मा के हाथ मे। इसलिए तुम जो कहोगे, वो समझेगा। तुम जो कहोगे, वो करेगा। वो चाहेगा कि तुम्हारी मांग उचित है, तो कुछ हो सकता है। क्योंकि दूसरा हाथ उसका परमात्मा का हाथ है। वो दोनों है।
गुरू के जैसा देने वाला नहीं है। गुरू का अर्थ है जो दिए चला जाए। पर वो जो दे रहा है, बड़ा सूक्ष्म है। अगर तुम क्षुद्र को मांगने गए हो तो वहां से खाली हाथ लौटोगे। अगर तुम विराट् को मांगने गए हो तो मिलेगा।
गुरू समान दाता नहीं ! लेकिन उसका दान तभी संभव हो सकता है, जब शिष्य भिखारी की तरह आए। तुम अगर अकड़े हुए आए, तुम अगर ऐसे आए, जैसे कि तुम हकदार हो, जैसे कि तुम्हे मिलना ही चाहिए, तो तुम चूक जाओगे।
गुरू के पास चुप होके बैठ जाना; उसकी मर्जी होगी, जब तुम तैयार होओगे-वो भर देगा। उसके हाथों में अपनें को छोड़ देना!
गुरू के चरणों में सिर रख दिया। उससे कुछ फ़र्क नहीं पड़ता। भीतर तो तुम झुकते हो नहीं, बाहर ही झुक जाते हो। भीतर ही तुम अकडे रहते हो।
बाहर बाहर झुकना आसान है। बाहर बाहर सम्मान बचाना आसान है। आज्ञा मान के चलना बहुत कठिन है, क्योकि वो भीतर झुकना है।
गुरु जो कहे, आज्ञा मानने का अर्थ है कि उसमें तुम तर्क मत लगाना। क्योंकि तुमने तर्क लगाया,सोचा, फिर माना, तो तुम अपनी आज्ञा मान रहे हो, गुरु की नहीं। तुम्हारी बुध्दि ने कहा, ठीक है, वो तुमने किया। लेकिन अगर बुध्दि तुम्हारी यह भी कहे कि ठीक नहीं है, तब भी तुम आज्ञा गुरु की ही मानना। तभी तो बुध्दि टूटेगी और गिरेगी। जब तुम बुध्दि की ही सुनते जाओगे, तुम सिर से नीचे न उतर सकोगे। हृदय तक तुम्हारी जड़े न पहुंच पाएंगी
आज्ञा का अर्थ है, वो जो कहे, तुम्हारी बुध्दि को संगत लगे, असंगत लगे, तुम अपना हिसाब मत लगाना। तुम बुध्दि को कहना कि तू किनारे हट, गुरु की सुनुंगा; और जैसे ही गुरु को सुनने की क्षमता बढ़ेगी, वैसे ही वैसे गुरु के सामने झुकने बढेग़ी जिस दिन तुम्हारी बुध्दि सिर से उतर जाएगी, गुरु तुम्हारी बुध्दि हो जाएगा। वो तुम्हारा विवके बन जाएगा।
शिष्य की समग्र साधना गुरु की छाया बन जाने की है। वो समग्र समर्पण है। वो अपने-आप को बिल्कुल खो देना है। तभी तो गुरु तुम्हें तैयार कर पाएगा-उस परम घटना के लिए जहां तुम्हारा आपा परमात्मा में खोएगा। अगर ठीक से समझो तो गुरु उस परम घटना की प्राथमिक तैयारी है-उस परम अनुभव की, जहां आत्मा परमात्मा में खो जाती है। गुरु में तुम खो के तैयारी करते हो। वो पूर्व प्रशिक्षण है। ......जब पूरा हो जाएगा, उसी क्षण द्वार खुल जाता है।